।।जैन लॉ : जैन समाज का अपना निजी कानून।।
व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी और सोशल प्लेटफ़ॉर्म्स पर अक्सर यह चर्चा होती रहती है कि “जैन समाज भी अल्पसंख्यक है, तो क्या जैनों का भी मुस्लिम पर्सनल लॉ की तरह अपना जैन पर्सनल लॉ (जैन लॉ) होना चाहिए?” यह सवाल न केवल तर्कपूर्ण है, बल्कि समाज की वैचारिक चेतना को भी जगाता है। क्या हमें भी एक “जैन निजी कानून” की मांग के लिए सरकार पर दबाव बनाना चाहिए?
बहुत कम लोगों को यह जानकारी है कि जैन लॉ (Jain Law) का अस्तित्व वास्तव में पहले से है। सन् 1926 में बैरिस्टर चम्पतराय जैन ने लंदन (इंग्लैंड) में “जैन लॉ” तैयार किया था। यह कोई केवल कल्पना या विचार नहीं था- ब्रिटिश राज के दौरान इस कानून के अंतर्गत कई मुकद मे भी चले और उनके निर्णय भी दिए गए।
हाल ही में इंदौर न्यायालय में एक जैन दम्पति की तलाक याचिका को इस आधार पर खारिज किया गया कि “जैन अब अल्पसंख्यक हैं और जैन निजी कानून में तलाक का कोई प्रावधान नहीं है।” बाद में अपील न्यायालय ने इस निर्णय को निरस्त करते हुए मामले को फ़िर से सुनवाई हेतु भेजा । यह प्रसंग एक बार फिर इस प्रश्न को सामने लाता है- क्या जैन समाज को अपने निजी कानून के पुनर्प्रतिष्ठापन के लिए संगठित प्रयास करने चाहिए?
जैन निजी कानून के प्रमुख प्रावधान
1. संपत्ति संबंधी नियम :
जैन लॉ के अनुसार स्त्री अपने पति की संपत्ति की पूर्ण स्वामिनी होती है। उसके ऊपर बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी होती है। इस व्यवस्था से यह सुनिश्चित होता है कि पुत्र सदाचार, शील और आज्ञापालन में आदर्श बनें।
पुत्री का केवल पितामह (दादा) की संपत्ति में अधिकार माना गया है। यदि कोई पुत्र धर्मभ्रष्ट, दुष्ट या अभद्र आचरण वाला हो, तो जैन नीति के अनुसार उसे घर से निष्कासित किया जा सकता है।
सबसे बड़े पुत्र का अधिकार विशेष माना गया है, किंतु मांसादि अभक्ष्य ग्रहण करने वाला पुत्र संपत्ति से वंचित रहता है। इस प्रकार संपत्ति विभाजन के लिए जैन नीति में कई स्पष्ट और नैतिक नियम निर्धारित किए गए हैं।
2. विवाह संबंधी प्रावधान:
जैन लॉ में विवाह केवल सामाजिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक संस्कार माना गया है। विवाह के समय वधु को जो कुछ प्राप्त होता है, वह “स्त्रीधन” कहलाता है- जिस पर उसका स्वतंत्र अधिकार होता है। भरण-पोषण, गुजारा भत्ता और संरक्षण के लिए भी अलग नियम निर्धारित हैं, जो हिन्दू विवाह अधिनियम से भिन्न हैं। विवाह हेतु वधु रोगरहित, उत्तम लक्षणों वाली और सद्गुणों से युक्त होनी चाहिए। वर भी गुणवान, निरोगी, दीर्घायु, श्रेष्ठ कुल का और सदाचारी हो।
बुआ की लड़की, मामा की लड़की या दूसरे गोत्र की लड़की से विवाह वैध है, जबकि मांसी की, स्व गोत्र की, या गुरु की पुत्री से विवाह वर्जित है। सात भांपर (फेरे) पूर्ण होने पर ही विवाह संपन्न माना जाता है।
3. पुत्र और उत्तराधिकार नियम:
जन्मना पुत्र न होने पर दत्तक पुत्र ग्रहण का प्रावधान है। पिता की संपत्ति ज्येष्ठ पुत्र को प्राप्त होती है, और छोटे भाई उसे पिता के समान मानकर उसकी आज्ञा में रहते हैं। माता की संपत्ति में कन्या का अधिकार होता है, चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित।
क्या जैन समाज को फिर से “जैन निजी कानून” की मांग करनी चाहिए? इतिहास साक्षी है कि जैन लॉ एक समय अस्तित्व में था और उसका विधिक प्रयोग भी हुआ। आज जब जैन समाज को अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त है, तो समाज को अपने इस अद्वितीय न्यायिक और नैतिक कानून को पुनर्जीवित करने की दिशा में गंभीर विचार करना चाहिए। यह केवल कानून की बात नहीं है- यह हमारी संस्कृति, मर्यादा और स्वतंत्र पहचान से जुड़ा विषय है। समय की मांग है कि समाज एकजुट होकर इस दिशा में विमर्श आरंभ करे और आवश्यक हो तो “जैन लॉ रिवाइवल कमिटी” जैसी पहल कर सरकार के समक्ष सुव्यवस्थित प्रस्ताव प्रस्तुत करे।
सौजन्य:जैन लॉ (Jain Law)
लेखक स्व. बैरिस्टर चम्पतराय जैन, विद्यावारिधि
सुगालचंद जैन, चेन्नई
10-11-25.