।।जैन संतों का समाज पर प्रभाव।।
भारतभूमि तप, त्याग और साधना की पवित्र भूमि है। यहां आज भी लगभग अठारह हज़ार जैन संत-वृन्द विभिन्न प्रदेशों में विचरणरत हैं। ये संत लगभग चार हज़ार स्थानों पर निवास करते हुए प्रतिदिन अपने प्रवचनों, उद्बोधनों और सान्निध्य से जनमानस में नीति, शान्ति और संवेदना के संस्कार भरते हैं। उनके इन अमृतमय उपदेशों का जैन समाज ही नहीं, समूचे राष्ट्र पर गहरा प्रभाव पड़ा है। जैन संतों के आशीर्वचन और आदर्श जीवन से प्रभावित होकर जैन समाज में अनेक श्रेष्ठ गुण विकसित हुए हैं –
1. शान्ति और सौहार्द का भाव
जैन समाज सामान्यतः शान्त, विनम्र और सहयोगी स्वभाव का है। वे अपने पड़ोसियों, मित्रों और रिश्तेदारों से अगाध प्रेमभाव रखते हैं तथा समाज में सद्भावना फैलाते हैं।
2. करुणा और संवेदनशीलता:
जैन समाज का प्रत्येक व्यक्ति जीवों के प्रति दया, करुणा और अहिंसा की भावना से ओतप्रोत रहता है। वे पशु-पक्षी, मनुष्य या किसी भी प्राणी के प्रति हिंसा एवं कष्ट पहुँचाने का स्वप्न में भी विचार तक नहीं करते हैं ।
3. सेवा और दान की परम्परा—-
जैन समाज में दान और सेवा को जीवन का अनिवार्य अंग माना गया है। शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक संस्थाओं को अपनी सामर्थ्य के अनुसार सहयोग देते हैं। अन्नदान, औषधदान, ज्ञानदान, अभयदान और अनुकम्पा दान में उनकी अग्रणी भूमिका रहती है।
4. सत्यनिष्ठा और ईमानदारी;
जैन समाज अपनी सत्यप्रियता और ईमानदारी के लिए विख्यात है। व्यापार, व्यवसाय या सरकारी नौकरी – हर क्षेत्र में वे निष्ठा और पारदर्शिता से कार्य करते हैं। उनके विरुद्ध कोई समाज-विरोधी, धर्म-विरोधी या देश-विरोधी गतिविधि प्रायः सुनने को नहीं मिलती हैं ।
5. कानूनपालक और अपराधमुक्त समाज हैं ।
भारतीय कारागारों में जैनों की संख्या नगण्य है। यह उनके संस्कार, संयम और आत्मानुशासन का जीता-जागता प्रमाण है।
6. विश्वास और वचनबद्धता ;
जैन लोग जबान के पक्के होते हैं। उनकी वचनबद्धता ही उनकी पहचान है। समाज में उन्हें विश्वसनीय और सच्चा नागरिक माना जाता है।
7. निष्पक्षता और समान अवसर;
जैन संस्थान जाति, धर्म या राजनीतिक भेदभाव से ऊपर उठकर नियुक्तियाँ करते हैं। वे प्रतिभा और कर्म को सर्वोच्च मानते हैं।
8. सदाचार और समाज में प्रतिष्ठा;
जैनों का नाम शायद ही किसी घोटाले, ठगी या गुनाह में सुनाई देता हो। यही कारण है कि समाज उन्हें सत्य और सदाचार के प्रतीक के रूप में देखता है।
इन सभी गुणों की जड़ में जैन संतों की वाणी, साधना और जीवनशैली निहित है। संतों के उपदेशों ने जैन समाज को न केवल आर्थिक रूप से सशक्त बनाया है, बल्कि उसे नैतिक, आध्यात्मिक और मानवीय दृष्टि से भी भारत के अग्रगण्य समाजों में प्रतिष्ठित किया है। वास्तव में – “जैन समाज की विश्वसनीयता, ईमानदारी और परोपकारिता – जैन संतों के सान्निध्य और संस्कारों की अमूल्य देन है।”
जैन संत समाज के दीपक हैं – जिनकी लौ से समाज का प्रत्येक घर आलोकित है।
सुगालचन्द जैन, चेन्नई
5-11-25.