आज श्री पार्श्वनाथ भगवान का च्यवन कल्याणक एवं केवलज्ञान कल्याणक है।
श्री पार्श्वनाथ परमात्मा के दस भव हुए। पूर्व भव में प्रभु की आत्मा प्राणत नाम के विमान में थी। वहाँ आयुष्य पूर्ण करके मतिज्ञान , श्रुतज्ञान और अवधिज्ञान के साथ इक्ष्वाकुवंश के कश्यप गोत्र के काशी देश की वाराणसी नगरी के राजा अश्वसेन की वामादेवी राणी की कुक्षी में फागन वद चौथ के दिन तुला राशि और विशाखा नक्षत्र में मध्यरात्रि में च्यवन हुआ। तब माता ने चौदह स्वप्न देखे।
श्री पार्श्वनाथ भगवान दीक्षा के चौरासी दिन प्रमाद निद्रा किये बिना आर्य अनार्य देश में विचरण करते हुए वाराणसी नगरी में आश्रमपद उद्यान में अठ्ठम का तप करके घातकी वृक्ष के नीचे ध्यान में थे तब फागुन वद चौथ के दिन विशाखा नक्षत्र में केवलज्ञान प्राप्त हुआ। लोकालोक के सर्व भावो को देखने और जानने लगे। परमात्मा अठारह दोषों से रहित हुए। आठ प्रातिहार्य और चौंतीस अतिशयों से युक्त हुए। तब देवताओं ने आकर समवसरण की रचना की।
