वीर लोंकाशाह द्वारा श्वेताम्बर परंपरा का अभ्युदय

वीर लोंकाशाह द्वारा श्वेताम्बर परंपरा का अभ्युदय
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आधारभूत क्रान्ति दृष्टा धर्मोद्धारक सद्धर्ममार्तण्ड श्रीमद् लोंकाशाह का जन्म वि.सं 1472 कार्तिक सुदी 15 (पूनम) के दिन हुआ।
विक्रम की सोलहवीं शताब्दी के प्रारम्भ काल में जैन समाज में एक धार्मिक क्रान्ति हुई जिसके सूत्रधार थे लोंकाशाह।
लोंकाशाह ने शास्त्रलेखन के प्रसंग में जैन धर्म के आचार मार्ग को जिस प्रकार समझा, समाज को तत्कालीन चर्चा उससे पूर्णतः भिन्न पाई। यह देख कर आपको बड़ा आघात पहुँचा और आपने समाज के सम्मुख सत्य को प्रकट कर दिया। विरोध के तीव्रातितीव्र तीक्ष्ण एवं कटु वातावरण में भी आप सत्य का प्रचार एवं प्रसार करते रहे। पीछे नहीं हटे। पुराने थोथे बाह्याडम्बरों से लोग घबरा कर ऊब चुके थे। धर्म में आये हुए विकारों से सभी सच्चे धर्म प्रेमियों को बड़ी चिन्ता थी, आत्मार्थियों की आन्तरिक कामना थी कि शुद्ध संयम मार्ग की विजय वैजयन्ती पुनः फहराई जाये ।जैन समाज में व्याप्त शिथिलाचार का उन्मूलन, कर शुद्ध जैन-धर्म की प्ररुपणा; शुद्ध आचार पक्ष को उजागर; जड़पूजा के स्थान पर गुण पूजा की प्रतिष्ठा । वीरलोंकाशाह द्वारा क्रान्ति का शंखनाद संवत 1508 में प्रकट हुआ।
उनका मत था कि हमारे देव वीतराग एवं अविकारी है, अतः उनकी पूजा भी उनके स्वरुपानुकूल ही आडम्बर रहित होनी चाहिए।धर्म में आये हुए बाह्य क्रियावाद यानी आडम्बर आदि विकारों को दूर करने के लिए जनसमुदाय को ललकारा था एवं कर्मकाण्ड में आये हुए विकारों का शोधन किया और सर्वसाधारण जन भी सरलता से कर सके, वैसी निर्दोष प्रणाली स्वीकार की। उन्होंने पूजनीय के सद्गुणों की ही पूजा को भवतारिणी मानी। आरम्भ को धर्म का अंग नहीं माना, क्योंकि पूर्वाचायों ने ‘आरम्भे नत्थि दया’ इस वचन से हिंसा रूप आरम्भ में दया नहीं होती यह प्रमाणित किया।
शास्त्र का वाचन करते हुए लोंकाशाह को बोध हुआ । उन्होंने समझा कि वस्तु के नाम, रूप या द्रव्य पूजनीय नहीं हैं। पूजनीय तो वास्तव में वस्तु के सद्गुण हैं। लोकाशाह की इस परम्परा विरोधी नीति से लोगों में रोष बढ़ना सहज था। गच्छवासियों ने शक्ति भर इनका विरोध किया पर ज्यों-ज्यों विरोध बढ़ता गया त्यों-त्यों उनकी ख्याति व महिमा भी बढ़ती गई। जो अल्पकाल में ही देश-व्यापी हो गई। गुजरात, पंजाब, उत्तरप्रदेश और राजस्थान में चारों ओर लोंकागच्छ का प्रचार व प्रसार हो गया।
लोकाशाह ने जिनधर्म की जनसाधारण को सरल एवं सटीक सुव्यवस्था, मर्यादा एवं उसके परिचालन के लिए श्रद्धा प्ररूपणा शासनहित की शुद्ध शास्त्र सम्मत क्रिया के पालन करावाने के लिए जागृत किया। इसी से प्रमाणित है कि अल्पतम समय में ही उनके विचारों का सर्वत्र आदर हुआ ।
लोकाशाह के विचारों से प्रभावित हो कर प्रथम भानाजी दीक्षित हुए। वे धर्मानुशासन और दृढ़ संयम के बड़े प्रेमी थे। लोकाशाह की दीक्षा के लिए ऐतिहासज्ञों में मतभेद है। कुछ उनका दीक्षित होना मानते हैं तो कुछ दीक्षित नहीं मानते पर गहरी गवेषणा से प्राप्त सामग्री में लोकाशाह की दीक्षा का उल्लेख भी प्राप्त होता है।
संभव है 1508 में उनके विचारों में जो क्रान्ति आई, वि.सं. 1524 या 1525 में मूर्त्तरूप धारण किया हो भाणजी आदि 45 व्यक्तियों ने वि. सं. 1531 मे मुनिव्रत धारण किया। संवत् 1636 के तपागच्छीय यति श्री कांतिविजय जी के लेखानुसार लोकाशाह ने सं. 1509 में सुमतिविजयजी के पास दीक्षा ग्रहण की थी। लोकाशाह के उपदेशों से सौराष्ट्र के धर्मवीर जागृत हो उठे, सेठ लखमसी भाणांजी, नूनजी आदि भक्तों ने त्याग का झण्डा उठा लिया और अल्प समय में ही कई आत्मार्थी साधु बन गये। परिग्रहधारी यतियों से श्रावक-समाज पूर्ण रूप से असंतुष्ट था अतः लोकाशाह का सत्य मार्ग सुनकर सब उस ओर झुकने लगे और लोंकागच्छ की निर्मल कीर्ति देश-विदेश में फैलने लगी। लोंकागच्छ परंपरा का मूल नाम “जिनमति” था।

आज दि 05.11.2025 को वीर लोंकाशाह जयंती। जो सिर्फ औपचारिकता मात्र ही है। जो आजकल स्थानकवासी परंपरा मे जड पूजा, आडंबर का चलन बढ़ रहा है क्या उस पल में चिंतन मनन होगा❓स्वस्थ परंपरा की ओर अपना कदम सम्यक् धारणा से आगे बढा सकेंगे❓यह अवश्यंभावी चिंतन मनन कर स्वस्थ्य परंपरा से ही वीर लोकाशाह की जयंती मनाना गुणानुवाद करना सार्थक है- अन्यथा सब व्यर्थ,निरर्थक,समय एवं धन का सर्व प्रकार से अपव्यय है।
आडंबर से दूर होना जरूरी है। आडंबरों में अर्थदंड का अनर्थदंड कार्य श्रावकों द्वारा ही किया जाता है। इसलिए श्रावक समाज को जागरूक होकर साधु साध्वी के संयम जीवन को सम्यक् रुप से पालना में सहायक होना चाहिए ताकि शासनपती वीर प्रभु महावीर द्वारा श्रावक श्राविकाओं को अम्मा पिया की पदवी से अभिषिक्त किया है, उसको सार्थक कर जिनशासन की महत्ती प्रभावना कर सकते है।

कुछ ग्रंथों से विवेचन संग्रह कर किया गया है। छदमस्थता से कोई त्रुटी हो तो मिच्छामि दुक्कडं ।
अशोक संचेती बेंगलोर
9243408284