महाराष्ट्र की जैन गुफाएँ कितनी प्राचीन हैं? एक नई शोध-परिकल्पना

मैदानी सर्वेक्षण एवं प्रत्यक्ष अवलोकन के आधार पर

सुनील कुमार जैन (समीर), पुणे


प्रस्तावना

महाराष्ट्र की प्राचीन गुफाओं का अध्ययन सामान्यतः उनके स्थापत्य, शैल-कट तकनीक तथा उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर किया जाता रहा है। प्रचलित कालक्रम में अनेक शैल-कट गुफाओं के निर्माण और विकास को मौर्यकाल तथा उसके बाद के कालखंडों से जोड़ा जाता है। परंतु महाराष्ट्र की विभिन्न जैन गुफाओं के प्रत्यक्ष सर्वेक्षण और फोटोग्राफी के दौरान सामने आए कुछ तथ्य इस विषय को पुनः वैज्ञानिक दृष्टि से देखने की आवश्यकता उत्पन्न करते हैं।

मैंने महाराष्ट्र की विभिन्न जैन गुफाओं का स्थल पर जाकर निरीक्षण किया है। ढांक, जुन्नर और धाराशिव जैसे स्थलों के तुलनात्मक अध्ययन में गुफाओं की स्थिति, धार्मिक प्रतिमाओं, अधिष्ठायक देवियों, स्थापत्य तथा उनके भौगोलिक स्थान से जुड़े कुछ ऐसे संकेत मिले हैं, जिनके आधार पर यह प्रश्न उठता है कि क्या इन गुफाओं का प्रारंभिक स्वरूप वर्तमान में माने जाने वाले काल से भी पहले अस्तित्व में था?

यह लेख किसी अंतिम निष्कर्ष का दावा नहीं करता, बल्कि प्रत्यक्ष सर्वेक्षण से प्राप्त संकेतों के आधार पर एक नई शोध-परिकल्पना प्रस्तुत करता है।


1. क्या गुफाओं का निर्माण मौर्यकाल से ही प्रारंभ हुआ?

प्रमुख प्रश्न यह है कि जिन गुफाओं का वर्तमान स्वरूप मौर्य अथवा उसके बाद के काल से जोड़ा जाता है, क्या वास्तव में उनका मूल धार्मिक या आश्रमिक उपयोग भी उसी समय से प्रारंभ हुआ था?

शैल-कट गुफा का निर्माण कई चरणों में हो सकता है। किसी स्थान पर प्राकृतिक शैलाश्रय या प्रारंभिक गुफा पहले से अस्तित्व में हो सकती है और बाद में उसे काटकर विस्तारित किया गया हो। आगे चलकर उसमें कक्ष, स्तंभ, मंडप, प्रतिमाएँ और सजावटी स्थापत्य जोड़े गए हों।

इसलिए किसी गुफा के वर्तमान स्थापत्य काल को ही उसके संपूर्ण अस्तित्व का प्रारंभिक काल मानना पुनर्विचार योग्य है।

मेरे सर्वेक्षणों से यह प्रश्न विशेष रूप से सामने आया है कि गुफा की आयु और गुफा के वर्तमान स्थापत्य की आयु अलग-अलग हो सकती है।


2. पार्श्वनाथ और अंबिका की उपस्थिति

महाराष्ट्र की जिन जैन गुफाओं का मैंने निरीक्षण किया, उनमें पार्श्वनाथ भगवान तथा नेमिनाथ के अधिष्ठायक देवी-स्वरूप से संबंधित अंबिका की उपस्थिति विशेष ध्यान आकर्षित करती है।

यदि किसी गुफा में पार्श्वनाथ की प्रतिमा या उनसे संबंधित धार्मिक परंपरा के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं और साथ ही अंबिका की प्रतिमा अथवा पहचान योग्य स्वरूप मिलता है, तो यह गुफा के धार्मिक उपयोग के इतिहास पर महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करता है।

यहाँ यह सावधानी आवश्यक है कि प्रत्येक स्त्री आकृति को अंबिका नहीं माना जा सकता। अंबिका की पहचान उसके विशिष्ट आयकॉनोग्राफिक लक्षणों के आधार पर ही की जानी चाहिए। इसलिए प्रत्येक प्रतिमा का वैज्ञानिक मूर्तिशास्त्रीय परीक्षण आवश्यक है।

फिर भी, अनेक स्थलों पर अंबिका की उपस्थिति का बार-बार सामने आना इस विषय पर स्वतंत्र अध्ययन की आवश्यकता को मजबूत करता है।


3. महावीर की अपेक्षा पार्श्वनाथ क्यों?

एक दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न भगवान महावीर से संबंधित है।

यदि किसी गुफा का धार्मिक विकास भगवान महावीर के समय या उनके बाद प्रारंभ हुआ माना जाता है, तो ऐसी गुफाओं में महावीर की प्रतिमाएँ प्रमुख रूप से अपेक्षित होनी चाहिए। लेकिन मेरे सर्वेक्षण में पार्श्वनाथ से संबंधित प्रतिमाएँ और उनके धार्मिक चिह्न विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करते हैं।

इससे एक महत्वपूर्ण शोध प्रश्न उत्पन्न होता है —

क्या कुछ गुफाओं में पार्श्वनाथ से संबंधित धार्मिक परंपरा महावीर के समय से पहले से ही विद्यमान थी और बाद के काल में उसी धार्मिक स्थल का विस्तार हुआ?

यह प्रश्न अभी प्रमाणित निष्कर्ष नहीं है, लेकिन इसे प्रतिमाओं की वैज्ञानिक तिथि, सामग्री, शैली और पुरातात्त्विक संदर्भ के माध्यम से जांचा जा सकता है।


4. अंबिका और पद्मावती की पहचान का प्रश्न

जैन गुफाओं के अध्ययन में यक्ष-यक्षिणियों की पहचान अत्यंत महत्वपूर्ण है।

पार्श्वनाथ से संबंधित पद्मावती और नेमिनाथ से संबंधित अंबिका — दोनों की अपनी विशिष्ट आइकोनोग्राफी है। इसलिए किसी गुफा में महिला देवता की उपस्थिति मिलने मात्र से उसकी पहचान अंबिका या पद्मावती के रूप में नहीं की जानी चाहिए।

मेरे सर्वेक्षण में जहाँ अंबिका के स्वरूप के संकेत मिले हैं, वहाँ इस पहचान को और अधिक वैज्ञानिक रूप से जांचने की आवश्यकता महसूस हुई।

यदि किसी स्थल पर पार्श्वनाथ के साथ पद्मावती की अपेक्षा अंबिका की स्पष्ट उपस्थिति मिलती है, तो यह धार्मिक परंपरा के विकास और प्रतिमा-स्थापना के कालक्रम को समझने के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न बन सकता है।


5. गुफा पहले या प्रतिमा पहले?

इस अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है।

यदि गुफा को बनाने के लिए कठोर चट्टान को काटने की तकनीक उपलब्ध थी, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि धार्मिक प्रतिमाओं के लिए उसी प्रकार बड़े पैमाने पर पत्थर की प्रतिमाएँ क्यों नहीं मिलतीं?

मेरे कुछ स्थलों के निरीक्षण में प्रतिमाओं में पत्थर के साथ-साथ मिट्टी अथवा अन्य मिश्रित सामग्री जैसी विशेषताएँ दिखाई दी हैं। किंतु यह केवल प्रत्यक्ष अवलोकन है; सामग्री की वैज्ञानिक पहचान अभी आवश्यक है।

इसलिए एक संभावित परिकल्पना यह हो सकती है कि —

गुफा या धार्मिक स्थान का उपयोग पहले से था और प्रतिमाएँ बाद के विभिन्न चरणों में अलग-अलग सामग्री से बनाई तथा स्थापित की गईं।

इसके विपरीत यह भी संभव है कि वर्तमान प्रतिमाएँ बाद के काल की हों और मूल प्रतिमाएँ नष्ट हो चुकी हों।

इन दोनों संभावनाओं को वैज्ञानिक परीक्षण से अलग करना आवश्यक है।


6. ढांक, जुन्नर और धाराशिव : व्यापारिक मार्गों का महत्व

ढांक, जुन्नर और धाराशिव — इन तीनों स्थलों का अध्ययन करते समय उनका भौगोलिक स्थान विशेष महत्व रखता है।

ये क्षेत्र प्राचीन आवागमन और व्यापारिक गतिविधियों से जुड़े मार्गों के संदर्भ में महत्वपूर्ण रहे हैं। ऐसे मार्गों के निकट धार्मिक स्थल विकसित होना स्वाभाविक है।

विशेष रूप से ढांक और धाराशिव में गुफाओं की संरचना का निरीक्षण करते समय मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि इनमें केवल साधारण प्राकृतिक आश्रय की भावना नहीं है, बल्कि कुछ स्थानों पर धार्मिक परिसर की एक प्रारंभिक संरचना दिखाई देती है।

गुफा के आसपास खुला स्थान, प्रवेश की दिशा, कक्षों की व्यवस्था, स्तंभ तथा जल-व्यवस्था जैसे तत्व इस संभावना की ओर संकेत करते हैं कि इनका उपयोग एक संगठित धार्मिक परिसर के रूप में हुआ होगा।

धाराशिव लेणी क्रमांक 3 में लगभग 23 सेल, अनेक पिलर, जैन तीर्थंकर प्रतिमाओं के अवशेष तथा जल-संबंधी संरचना जैसे तत्व सर्वेक्षण में दर्ज किए गए हैं।


7. मंदिर की प्रारंभिक संरचना की संभावना

ढांक और धाराशिव की गुफाओं का निरीक्षण करते हुए एक और विचार सामने आता है।

आज जिस प्रकार किसी मंदिर में निम्न तत्व होते हैं —

  • मुख्य प्रवेश
  • गर्भगृह या मुख्य प्रतिमा का स्थान
  • आसपास के कक्ष
  • सभा क्षेत्र
  • स्तंभ
  • जल की व्यवस्था

उसी प्रकार के कुछ प्रारंभिक स्थापत्य संकेत इन गुफा परिसरों में भी दिखाई देते हैं।

इस आधार पर यह विचार किया जा सकता है कि शैल-कट गुफाएँ केवल साधु निवास या आश्रय के लिए ही नहीं, बल्कि प्रारंभिक धार्मिक मंदिर-संरचना के रूप में भी विकसित हुई हों।

यह परिकल्पना स्थापत्य के तुलनात्मक अध्ययन द्वारा जांची जानी चाहिए।


8. गुफा के जीर्णोद्धार और मूल निर्माण में अंतर

किसी गुफा में दिखाई देने वाला प्रत्येक स्थापत्य तत्व मूल निर्माण का नहीं होता।

धाराशिव लेणी क्रमांक 3 के सर्वेक्षण में अनेक पिलरों पर बाद के जीर्णोद्धार, मरम्मत और प्लास्टर के संकेत दिखाई दिए।

इससे यह स्पष्ट होता है कि गुफाओं में अलग-अलग कालखंडों में परिवर्तन हुए होंगे।

अतः किसी गुफा को केवल उसके वर्तमान स्वरूप के आधार पर दिनांकित करना पर्याप्त नहीं है। हमें कम से कम तीन स्तरों को अलग-अलग देखना होगा —

  • प्रथम — मूल शैलाश्रय या प्रारंभिक गुफा।
  • द्वितीय — उसका धार्मिक एवं स्थापत्य विकास।
  • तृतीय — बाद के जीर्णोद्धार, प्रतिमा स्थापना और सजावट।

इन तीनों को अलग किए बिना सही कालक्रम निर्धारित करना कठिन होगा।


9. धाराशिव लेणी क्रमांक 3 से प्राप्त संकेत

धाराशिव लेणी क्रमांक 3 का प्रत्यक्ष सर्वेक्षण इस अध्ययन का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

लेणी में चौमुखी पाषाण पिलर मिले, जिन पर विभिन्न दिशाओं में जैन तीर्थंकर प्रतिमाओं के उत्कीर्ण अवशेष दिखाई देते हैं।

सामने की दीवार के एक सेल में पद्मासन ध्यान मुद्रा में तीर्थंकर प्रतिमा, छत्र, चामरधारी आकृतियाँ तथा श्रीवत्स चिह्न का उल्लेख सर्वेक्षण में किया गया है।

लगभग बारहवीं सेल में सात फण वाली पार्श्वनाथ प्रतिमा भी दर्ज की गई है। प्रतिमा सिंहासन पर विराजमान है तथा उसके दोनों ओर मकर आकृतियाँ और चामरधारी आकृतियाँ दिखाई देती हैं।

ये सभी अवलोकन यह प्रमाणित करते हैं कि धाराशिव लेणी 3 का जैन धार्मिक एवं मूर्तिकला संबंध गंभीर अध्ययन का विषय है।

हालाँकि इन प्रतिमाओं की निश्चित तिथि अभी वैज्ञानिक परीक्षण से निर्धारित नहीं हुई है।


10. प्रतिमाओं की तिथि और गुफाओं की तिथि अलग-अलग निर्धारित होनी चाहिए

इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव यही है कि भविष्य में गुफाओं और प्रतिमाओं का कालक्रम अलग-अलग निर्धारित किया जाए।

केवल यह कह देना कि गुफा अमुक काल की है, उससे उसमें स्थित प्रत्येक प्रतिमा उसी काल की सिद्ध नहीं होती। निम्न संभावनाएँ सदैव विद्यमान रहती हैं —

  • प्रतिमाएँ बाद में स्थापित हो सकती हैं।
  • पुरानी प्रतिमाओं का पुनः उपयोग हो सकता है।
  • पुरानी गुफा का बाद में विस्तार हो सकता है।
  • गुफा का जीर्णोद्धार हो सकता है।
  • मूल प्रतिमाएँ नष्ट होने के बाद नई प्रतिमाएँ स्थापित की जा सकती हैं।

इसलिए “गुफा की तिथि = प्रतिमा की तिथि” का सीधा समीकरण वैज्ञानिक दृष्टि से स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।


11. वैज्ञानिक परीक्षण की आवश्यकता

मेरे मत में महाराष्ट्र की जैन गुफाओं पर अब केवल पारंपरिक स्थापत्य-शैली और अनुमानित कालक्रम के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय बहुविषयक वैज्ञानिक सर्वेक्षण होना चाहिए।

विशेष रूप से निम्न परीक्षण उपयोगी होंगे —

  1. प्रतिमाओं की सामग्री की वैज्ञानिक पहचान।
  2. मिट्टी/लेप/प्लास्टर के नमूनों का प्रयोगशाला परीक्षण।
  3. जहाँ जैविक पदार्थ उपलब्ध हो वहाँ रेडियोकार्बन डेटिंग।
  4. उपयुक्त सामग्री पर Thermoluminescence अथवा अन्य उपयुक्त dating technique।
  5. शैल-सतह का वैज्ञानिक अध्ययन।
  6. रंग एवं पिगमेंट का विश्लेषण।
  7. गुफा की विभिन्न निर्माण-परतों का अध्ययन।
  8. उच्च-रिजॉल्यूशन फोटोग्राफी।
  9. 3D स्कैनिंग एवं डिजिटल अभिलेखीकरण।
  10. अभिलेख, मूर्तिशास्त्र और स्थापत्य का तुलनात्मक अध्ययन।

विशेष रूप से यह ध्यान रखना आवश्यक है कि पत्थर की प्रतिमा की सीधे Carbon-14 dating सामान्यतः संभव नहीं होती। इसलिए प्रत्येक प्रतिमा और सामग्री के अनुसार उपयुक्त वैज्ञानिक विधि चुननी होगी।


12. एक नई शोध-परिकल्पना

मेरे वर्तमान मैदानी सर्वेक्षण के आधार पर एक संभावित परिकल्पना यह है कि महाराष्ट्र की कुछ जैन गुफाओं का धार्मिक उपयोग उनके वर्तमान स्थापत्य-काल से पहले प्रारंभ हुआ हो सकता है।

संभव है कि निम्न क्रम रहा हो —

प्रारंभिक धार्मिक स्थल / शैलाश्रय → प्रारंभिक गुफा → धार्मिक उपयोग → स्थापत्य विकास → प्रतिमा स्थापना → जीर्णोद्धार एवं सजावट

इस परिकल्पना की पुष्टि या खंडन वैज्ञानिक परीक्षण से ही किया जा सकता है।


निष्कर्ष

महाराष्ट्र की जैन गुफाएँ केवल शैल-कट स्थापत्य के उदाहरण नहीं हैं। वे धार्मिक इतिहास, व्यापारिक मार्गों, मूर्तिकला, साधु-संघों, जल-व्यवस्था तथा प्राचीन धार्मिक वास्तुकला के विकास को समझने के लिए महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

ढांक, जुन्नर और धाराशिव जैसे स्थलों में प्राप्त जैन प्रतिमाओं, पार्श्वनाथ एवं अंबिका से संबंधित संकेतों तथा गुफाओं की स्थापत्य संरचना को एक साथ रखकर देखने पर अनेक नए प्रश्न सामने आते हैं।

इन प्रश्नों का उत्तर केवल अनुमान से नहीं दिया जा सकता।

यदि गुफाएँ वास्तव में वर्तमान में माने गए काल से पूर्व अस्तित्व में थीं, तो उनका प्रमाण गुफा की दीवारों से अधिक उनकी पुरातात्त्विक परतों, प्रतिमाओं की सामग्री, शिल्प-शैली और वैज्ञानिक काल-निर्धारण में खोजा जाना चाहिए।

अतः महाराष्ट्र की जैन गुफाओं और उनमें प्राप्त प्रतिमाओं का एक स्वतंत्र, बहुविषयक और वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया जाना आवश्यक है।

संभव है कि इस प्रकार का अध्ययन महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि भारत में जैन धर्म और शैल-कट धार्मिक वास्तुकला के प्रारंभिक इतिहास को समझने की हमारी वर्तमान धारणाओं में महत्वपूर्ण संशोधन प्रस्तुत करे।

यह मेरा अंतिम ऐतिहासिक निष्कर्ष नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की जैन गुफाओं के प्रत्यक्ष सर्वेक्षण से उत्पन्न एक शोध-परिकल्पना है, जिसकी वैज्ञानिक जाँच आवश्यक है।


लेखक
सुनील कुमार जैन (समीर)
पुणे
महाराष्ट्र की जैन गुफाओं का प्रत्यक्ष सर्वेक्षण एवं फोटोग्राफिक दस्तावेजीकरण