🌹 भगवान महावीर निर्वाण वर्ष की प्रेरणा से सेवा का साकार रूप

बेंगलुरु का भगवान महावीर जैन अस्पताल

भगवान महावीर के उपदेश केवल ग्रंथों में पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि जीवन और समाज में उतारने के लिए हैं। जब अहिंसा, करुणा, सेवा और अनुकम्पा का संदेश व्यवहार में उतरता है, तभी धर्म की सच्ची सार्थकता प्रकट होती है।

यही कारण है कि जब भी समाज ने इन आदर्शों को अपने कार्यों का आधार बनाया है, तब-तब ऐसी संस्थाएँ खड़ी हुई हैं जो पीड़ित मानवता के लिए आश्रय बन जाती हैं।


महावीर निर्वाण वर्ष से प्रेरणा

सन् 1975 में भगवान महावीर निर्वाण वर्ष पूरे भारतवर्ष में अत्यंत श्रद्धा, उत्साह और भक्ति के साथ मनाया गया। उस अवसर पर समाज में यह भावना जागृत हुई कि भगवान महावीर के उपदेश केवल स्मरण में ही सीमित न रहें, बल्कि समाज-जीवन में स्थायी रूप से प्रतिष्ठित हों।

इसी प्रेरणा से बेंगलुरु में भगवान महावीर मेमोरियल जैन ट्रस्ट की स्थापना की गई। इसी ट्रस्ट के अंतर्गत भगवान महावीर जैन अस्पताल का निर्माण हुआ।

पिछले लगभग 50 वर्षों से यह अस्पताल निस्वार्थ सेवा की परंपरा निभाते हुए समाज के लिए वरदान बना हुआ है।


सेवा और करुणा पर आधारित चिकित्सा

कुछ वर्ष पूर्व ट्रस्टियों ने यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया कि अस्पताल की सेवा-भावना भगवान महावीर के सिद्धांतों पर आधारित होगी:

  • अहिंसा

  • सेवा

  • अनुकम्पा

  • करुणा

अस्पताल में आने वाले प्रत्येक मरीज की बिना किसी भेदभाव के सेवा की जाती है। यह भी सुनिश्चित किया गया है कि कोई भी व्यक्ति केवल आर्थिक अभाव के कारण उपचार से वंचित न रहे।


आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के लिए सहायता

अंग्रेज़ी की प्रसिद्ध कहावत “Charity begins at home” को व्यवहार में उतारते हुए अस्पताल ने विशेष व्यवस्था की है।

  • सामान्य वार्ड में भर्ती आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को लगभग 50% तक की रियायत दी जाती है।

  • जैन स्वबन्धुओं को यह सुविधा बिना किसी औपचारिक आवेदन के प्रदान की जाती है।

  • यदि कोई मरीज भुगतान करने में असमर्थ हो, तो उसकी आवश्यकता के अनुसार अतिरिक्त सहायता भी दी जाती है।

इस प्रकार यह अस्पताल केवल चिकित्सा का केंद्र नहीं, बल्कि करुणा और सह-अस्तित्व का जीवंत उदाहरण बन गया है।


आधुनिक सुविधाओं से युक्त अस्पताल

आज इस अस्पताल में चिकित्सा के लगभग सभी प्रमुख विभाग उपलब्ध हैं और उनकी गुणवत्ता किसी भी कॉर्पोरेट अस्पताल से कम नहीं है।

  • लगभग 300 बेड की सुविधा

  • आधुनिक चिकित्सा विभाग

  • गुणवत्तापूर्ण उपचार व्यवस्था

इस अस्पताल में लगभग 30–35 प्रतिशत जैन स्वबन्धु लाभान्वित हो रहे हैं। संभवतः जैन समाज द्वारा स्थापित यह एक ऐसा संस्थान है जिसे समाज ने इतने बड़े स्तर पर अपनाया है।


भविष्य की योजना – कैंसर अस्पताल

हाल ही में मेरी मुलाकात अस्पताल के सचिव श्री पारसमलजी भंडारी और
श्री प्रकाशचंदजी तथा मोहनलालजी रांका से हुई।

बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि समाज के सहयोग से 500 बेड के एक आधुनिक कैंसर अस्पताल की स्थापना की योजना बनाई जा रही है। इस परियोजना का कार्यान्वयन निकट भविष्य में प्रारंभ होगा।

यदि यह योजना साकार होती है, तो दक्षिण भारत में यह एक विशिष्ट संस्थान होगा जहाँ बड़ी संख्या में जैन समाज के लोग उपचार प्राप्त करेंगे और आर्थिक रूप से कमजोर भाइयों को विशेष सहारा मिलेगा।


समाज के सहयोग से बढ़ती सेवा

आदरणीय पारसमलजी के अनुसार, जब से यह अस्पताल बेंगलुरु में समाज के कमजोर वर्ग का सहारा बना है, तब से दानदाताओं का सहयोग भी निरंतर बढ़ता गया है।

आज इसका परिणाम यह है कि 35 प्रतिशत से अधिक जैन बन्धु यहाँ से लाभान्वित हो रहे हैं।

इसके साथ ही जैन साधु-साध्वियों का उपचार भी समाचारी के अनुरूप पूर्ण श्रद्धा और सावधानी के साथ किया जाता है, जिससे धार्मिक मर्यादाओं का पूरा सम्मान बना रहता है।


समाज के लिए संदेश

यह अनुभव हमें यह भी सिखाता है कि जब किसी संस्था का लक्ष्य स्वबन्धु सेवा और मानवीय करुणा होता है, तब समाज का विश्वास और सहयोग दोनों अपने आप जुड़ जाते हैं।

अतः मेरा विनम्र निवेदन है कि जैन समाज द्वारा स्थापित शिक्षण एवं स्वास्थ्य संस्थानों के पदाधिकारी केवल संस्थागत विकास तक ही सीमित न रहें, बल्कि आर्थिक रूप से कमजोर स्वबन्धुओं की सहायता को भी अपनी प्राथमिकता बनाएँ।

यही भावना संस्थाओं को जीवंत बनाती है और समाज के भीतर आत्मीयता का सेतु भी निर्मित करती है।


निष्कर्ष

किसी भी संस्था की सबसे बड़ी सफलता भवनों की भव्यता या संसाधनों की प्रचुरता नहीं होती, बल्कि यह होती है कि वह अपने समाज के कमजोर व्यक्ति के लिए कितनी सहायक और सहारा बन पाती है।

जब सेवा का केंद्र अपने स्वबन्धु बनते हैं, तब ही धर्म का वास्तविक फल प्रकट होता है।

स्वबन्धु सेवा को लक्ष्य बनाना ही सच्ची उपलब्धि है।


✍️ लेखक:
सुगालचंद जैन
चेन्नई
8-3-2026