।।🌹जैन पत्र-पत्रिकाएँ : समाज के चौथे स्तंभ की जागरूकता की पुकार🌹।।
जैन समाज के चारों सम्प्रदायों से जुड़ी लगभग सौ से अधिक साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक, अर्धवार्षिक एवं वार्षिक पत्र-पत्रिकाएँ आज निरन्तर प्रकाशित हो रही हैं। यह निःसंदेह जैन समाज की बौद्धिक सक्रियता और संगठनात्मक क्षमता का प्रमाण है। पत्र-पत्रिकाएँ समाज के लिए दर्पण के समान होती हैं, जिनमें समाज अपना वास्तविक स्वरूप देख सकता है-अपनी उपलब्धियाँ भी और अपनी कमियाँ भी। इस दृष्टि से पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादक एवं पत्रकार समाज के सामरिक नहीं, बल्कि नैतिक प्रहरी माने जाने चाहिए।
समाज उनसे यह अपेक्षा करता है कि वे समाज में व्याप्त भूलों, विचलनों और शिथिलाचार को निर्भीकता से उजागर करें, ताकि समाज दिशा से भटके नहीं और साधु-संत समुदाय भी अपने मूल मार्ग से दूर न जाए। जिस प्रकार गाड़ी को सही पटरी पर रखने के लिए समय-समय पर जाँच आवश्यक होती है, उसी प्रकार समाज को भी सतत आत्ममंथन की आवश्यकता होती है। प्रश्न यह है कि क्या हमारी पत्र-पत्रिकाएँ इस महत्त्वपूर्ण कर्तव्य का सम्यक निर्वहन कर पा रही हैं?
दुर्भाग्यवश, अधिकांश पत्र-पत्रिकाएँ समाज में बढ़ते शिथिलाचार, आडम्बर और मूल सिद्धान्तों से हो रहे विचलन जैसे विषयों पर प्रायः मौन दिखाई देती हैं। समाज की ऊर्जा का सही दिशा में उपयोग कैसे हो, इस पर भी गंभीर लेखनी बहुत कम देखने को मिलती है। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में अधिकतर लेख पूर्व आचार्यों एवं संतों के उद्धरणों तक सीमित रहते हैं, जबकि वर्तमान संत समुदाय तथा जैन विद्वानों की मौलिक और समसामयिक लेखनी अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है। यह आत्मचिन्तन का विषय है कि क्या आज के जैन विद्वान लिख नहीं रहे हैं, या फिर उनके विचारों को पर्याप्त मंच नहीं मिल पा रहा है।
पत्र-पत्रिकाओं का उद्देश्य केवल सूचना देना ही नहीं, बल्कि समाज को दिशा देना, चेताना और प्रेरित करना भी होना चाहिए। यदि समाज के भीतर समस्याएँ पनप रही हैं और उन पर खुलकर चर्चा नहीं हो रही, तो यह चौथे स्तंभ की भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगाता है। निर्भीक, तथ्यात्मक और समाधान-केन्द्रित लेखनी ही समाज को नई चेतना दे सकती है।
मेरी जैन समाज के समस्त पत्रकारों एवं पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादकों से विनम्र अपील है कि वे अपनी पत्र-पत्रिकाओं में वर्तमान समय में जैन समाज द्वारा सामना की जा रही ज्वलन्त समस्याओं पर गंभीरता से कलम चलाएँ, जैसे-जैन दर्शन के अनुयायियों की घटती जनसंख्या,जैन समाज में गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों की स्थिति, जैन दर्शन को जन-जन तक पहुँचाने की ठोस योजनाएँ,समाज में बढ़ता शिथिलाचार, आडम्बर और दिखावे की प्रवृत्ति, तथा “अहिंसा के नाम पर हिंसा” जैसी विडम्बनाएँ।
इन विषयों पर सार्थक, संतुलित और समाधानपरक चर्चा समय की आवश्यकता है। पत्र-पत्रिकाएँ यदि निर्भीक होकर यह भूमिका निभाएँगी, तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन अवश्य आएगा। समाज को सही दिशा-निर्देश देने के लिए चौथे स्तंभ का सशक्त, सजग और संवेदनशील होना अत्यन्त आवश्यक है।
आइए, हम सब मिलकर ऐसी पत्रकारिता को प्रोत्साहित करें जो केवल प्रशंसा तक सीमित न रहे, बल्कि समाज को आईना दिखाने का साहस भी रखे-क्योंकि स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए सत्य का सामना करना अनिवार्य है।
सुगालचन्द जैन, चेन्नई
31-1-26