।।🌹बिखराव से बाहर निकलें, एकीकरण की ओर बढ़ें🌹।।
सन् 1975 में आचार्य विनोबा भावे, जो जन्म से जैन नहीं थे किंतु कर्म से पूर्ण जैन थे, उन्होंने जैन दर्शन की विश्व-शांति स्थापित करने वाली शक्ति को पहचाना। इसी अनुभूति से प्रेरित होकर उन्होंने जैन
समाज के एकीकरण के लिए ऐतिहासिक प्रयास किए। उनके प्रयासों से “समण सुत्तम्” जैसे ग्रंथ का प्रकाशन हुआ, जिसे जैन समाज के चारों घटकों ने स्वीकार किया। जैन ध्वज और जैन प्रतीक भी उसी काल की दूरदर्शी सोच की देन हैं।
भारत सरकार ने 1975 में भगवान महावीर के 2500 वे निर्वाण महोत्सव के उपलक्ष में दिल्ली में चारों घटकों द्वारा स्थापित भगवान महावीर मेमोरियल समिति को लगभग चार एकड़ भूमि और पाँच लाख रुपये की सहायता प्रदान की थी, ताकि उस स्थान पर विश्वस्तरीय पुस्तकालय, संग्रहालय और शोध केंद्र स्थापित हो सकें। उद्देश्य स्पष्ट था- भगवान महावीर की वाणी को जन-जन तक पहुँचाना और जैन दर्शन को वैश्विक मंच देना।
परंतु यह अत्यंत पीड़ादायक सत्य है कि आज, लगभग पाँच दशकों बाद भी, उस भूखंड पर ऐसा कोई कार्य दिखाई नहीं देता जिस पर जैन समाज गर्व कर सके। इसके विपरीत, भूखंड के मूल्यांकन, अधिकार और वर्चस्व को लेकर अधिक चर्चा होती है, जबकि समाज को जोड़ने और विचार को फैलाने की चिंता गौण हो गई है।
भगवान महावीर मेमोरियल समिति के संविधान में यह प्रावधान है कि भारत के सभी जैन बंधु बिना संप्रदायिक या आर्थिक भेदभाव के आजीवन सदस्य बन सकते हैं, वह भी मात्र 1100 रुपये की सदस्यता शुल्क पर। इसके बावजूद, सीमित संख्या में लोग इस संस्था पर अपना एकाधिकार बनाए बैठे हैं। यह स्थिति न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि महावीर के सिद्धांतों के सर्वथा विपरीत भी है।
यह समय आत्ममंथन का है। क्या हमने यह ठान लिया है कि हम महावीर को तो मानेंगे, पर उनके बताए मार्ग पर नहीं चलेंगे? क्या हमारी आस्था केवल वाणी तक सीमित रह गई है और जीवन से बाहर हो गई है?
वहीं विश्नोई समाज आज हमें आईना दिखा रहा है। विश्नोई समाज पर्यावरण संरक्षण कानून कि संरक्षणा के लिए सरकार पर दबाव शान्ति मय एवं अहिंसक तरीके से अनशन कर रहे हैं इन के दबाव का प्रभाव इसलिए होगा कि पूरा विश्नोई समाज एकीकृत हैं एवं उनका केंद्रीय नेतृत्व समय समय पर दिशा निर्देश भी देता हैं ।
मैं विश्नोई समाज को हृदय से बधाई देता हूँ कि वे भगवान महावीर द्वारा प्रतिपादित “पर्यावरण संरक्षण” के सिद्धांत को जी रहे हैं। साथ ही जैन समाज से विनम्र किंतु दृढ़ निवेदन करता हूँ कि यदि वास्तव में हमारे मन में महावीर के प्रति श्रद्धा है, तो हमें भी विश्नोई समाज की तरह केन्द्रित होकर कार्य करना होगा।
महावीर के पंचशील- संदेश – को केवल उपदेशों में नहीं, बल्कि व्यवहार में उतारना होगा। इन्हें स्वयं अपनाकर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने का संकल्प लेना होगा।
दिल्ली में 1975 में आबंटित भूखंड किसी व्यक्ति या समूह की मिल्कियत नहीं, बल्कि पूरे जैन समाज की अमानत है। उसका उपयोग भूमि-मूल्य बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि मानव-मूल्य बढ़ाने के लिए होना चाहिए। जन-जन को जोड़कर, जन-जन तक भगवान महावीर की वाणी पहुँचाने का यही मार्ग है। यदि मेरे इन शब्दों से किसी को पीड़ा पहुँची हो तो मैं क्षमा प्रार्थी हूँ, परंतु मौन रहना भी पाप के समान है। जागना होगा, जुड़ना होगा और महावीर के मार्ग पर चलकर ही हमें जैन कहलाने का अधिकार मिलेगा।
सुगाल चंद जैन, चेन्नई
8-2-26.