प्राकृत भाषा एवं जैनदर्शन के अप्रतिम वरिष्ठ विद्वान् :आचार्य फूलचन्द्र जैन प्रेमी जी
आचार्य फूलचन्द्र जैन प्रेमी जी
प्राच्य विद्या एवं जैन जगत् के वरिष्ठ मनीषी, श्रुतसेवी आदरणीय
प्रो. डॉ. फूलचन्द्र जैन प्रेमी जी श्रुत साधना की एक अनुकरणीय मिसाल हैं। उनका सम्पूर्ण जीवन भारतीय प्राचीन विद्याओं, भाषाओं, धर्मों, दर्शनों एवं संस्कृतियों के संरक्षण और संवर्धन को समर्पित रहा है।
काशी में निवास करते हुए वे आज अपने जीवन के पचहत्तर वर्ष तथा विवाह के पचास वर्ष पूर्ण कर रहे हैं। इस आयु में भी युवाओं से अधिक जोश, लगन और समर्पण के साथ वे अपने मिशन में निरंतर सक्रिय हैं।
काशी की विद्वत् परंपरा में स्थान
काशी प्राचीन काल से ही विद्वानों की समृद्ध परंपरा का केंद्र रही है। प्रो. प्रेमी जी इस पांडित्य परंपरा के ऐसे महनीय मनीषी हैं, जिनका सौम्य स्वभाव, मधुर वाणी, विनम्रता और निरभिमानता उन्हें सभी वर्गों में अत्यंत आत्मीय बनाती है।
जीवन संदेश
“चुपचाप अपनी कर्तव्य साधना ईमानदारी से करते रहो।
सफलता केवल प्रतिभा से नहीं, बल्कि शुद्ध लक्ष्य और भाव से प्राप्त होती है।”
शिक्षा एवं अकादमिक यात्रा
प्रारंभिक शिक्षा ग्राम के सरकारी विद्यालय से प्राप्त करने के पश्चात् आपने कटनी स्थित श्री शान्ति निकेतन जैन संस्कृत विद्यालय में अध्ययन किया।
आगे चलकर काशी के सुप्रसिद्ध श्री स्याद्वाद महाविद्यालय एवं काशी हिंदू विश्वविद्यालय से आपने शास्त्री, आचार्य, एम.ए. तथा
‘मूलाचार का समीक्षात्मक अध्ययन’ विषय पर पीएच.डी. उपाधि प्राप्त की।
सेवाकाल एवं पद
आपने जैन विश्व भारती, लाडनूं में अध्यापन, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी में 32 वर्षों तक विभागाध्यक्ष तथा आचार्य पद पर सेवा दी। इसके पश्चात् भोगीलाल लहेरचन्द इंस्टिट्यूट ऑफ इंडोलॉजी, दिल्ली के निदेशक रहे।
मौलिक ग्रन्थ
- मूलाचार का समीक्षात्मक अध्ययन
- लाडनूं के जैन मंदिर का कला वैभव
- जैनधर्म में श्रमणसंघ
- जैन साधना पद्धति में तप
- प्राकृत भाषा विमर्श
- श्रमण संस्कृति एवं वैदिक व्रात्य
सम्पादित ग्रन्थ
- मूलाचार भाषा वचनिका
- प्रवचन परीक्षा
- तीर्थंकर पार्श्वनाथ
- आदिपुराण परिशीलन
- आत्मप्रबोध
- आत्मानुशासन
- संस्कृत वाड्मय का बृहद् इतिहास (द्वादशवाँ खण्ड)
- बीसवीं सदी के जैन मनीषियों का अवदान
- आवश्यक निर्युक्ति
- मथुरा का जैन सांस्कृतिक पुरा वैभव
- जैन विद्या के विविध आयाम
- स्याद्वाद महाविद्यालय शताब्दी स्मारिका
- ऋषभ सौरभ
- अभिनन्दन ग्रन्थ (अनेक)
प्रमुख सम्मान एवं पुरस्कार
- श्री चांदमल पाण्ड्या पुरस्कार (1981)
- महावीर पुरस्कार (1988, 2019)
- विशिष्ट पुरस्कार – उ.प्र. संस्कृत संस्थान (1998)
- श्रुतसंवर्धन पुरस्कार (1998)
- गोम्मटेश्वर विद्यापीठ पुरस्कार (2000)
- अहिंसा इंटरनेशनल अवार्ड (2009)
- जैन आगम मनीषा सम्मान (2013)
- राष्ट्रपति सम्मान (2018)
- ऋषभदेव पुरस्कार (2023)
निष्कर्ष
प्रो. प्रेमी जी का जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि ईमानदारी, प्रामाणिकता और कर्तव्यनिष्ठा के साथ किया गया श्रुत-अध्ययन न केवल व्यक्ति को महान बनाता है, बल्कि समाज और संस्कृति को भी समृद्ध करता है।
— प्रो. अनेकान्त कुमार जैन
