कल्याणकारी क्रिया-महिलाओं के द्वारा भगवान का पंचामृत अभिषेक

(25)कल्याणकारी क्रिया-महिलाओं के द्वारा भगवान का पंचामृत अभिषेक

§ आचार्य शान्तिसागर जी महाराज

श्रीशान्तिसागर महामुनि का चरित्र पुस्तक के लेखक सोलापुर के पं॰ वंशीधर शास्त्री ने प्रसंग प्रस्तुत करके स्पष्ट किया है कि आचार्य शान्तिसागर महाराज ने सन् १०-४-१९२९ में गणेशगंज, शाहपुर (सागर) में ‘स्त्री जिन मूर्ति का अभिषेक करें या नहीं ?’ इस प्रश्न का उत्तर निषेधात्मक दिया ।

यह पूर्वार्ध है । उत्तरार्ध के प्रत्यक्षदर्शी जानते हैं कि उन्होंने सल्लेखना तक महिलाओं द्वारा किये गये पञ्चामृताभिषेक को देखा । क्या वे अपनी ही मान्यता से विपरीत क्रिया देखने को बाध्य थे ? इसका समाधान आगामी वृत्तान्त से हो जाता है, जो नाँदगाँव, महाराष्ट्र का है ।

विक्रम संवत् २००५ (सन् १९४८) में आचार्य शान्तिसागर महाराज का जन्म जयन्ती समारोह नाँदगाँव में मनाया गया । पण्डित मनोहरलाल शाह द्वारा लिखित पुस्तक ‘पञ्चामृत अभिषेकादि के शास्त्रीय प्रमाण’ उनकी सम्मति लेने हेतु उन्हें भेंट की गयी । आद्योपान्त पठनोपरान्त आचार्यश्री बोलें~

“पुस्तक अच्छी है । प्रचार होना चाहिये । जब इसमें पूर्वाचार्यों की ही सम्मति लिखी गयी है, तो हमारी सम्मति अपने आप हो जाती है । हमें आचार्य-वाक्य प्रमाण है ।”

§ आचार्य वीरसागर जी महाराज
“आर्ष-ग्रन्थोंमें प्रतिपादित कल्याणकारी क्रियाओं के प्रति प्रमाद से शिथिलाचारी बनना ठीक नहीं है । यथाविधि अभिषेक-पूजादि करने से श्रावकों को पुण्य-बन्ध ही नहीं, कर्म-निर्जरा भी होती है ।”

§ आचार्य शिवसागर जी महाराज
सागर के विधवा आश्रम की ब्रह्मचारिणी सुमित्राबाई दीक्षा लेना चाहती थीं । आचार्य शिवसागर महाराज बोलें, “दीक्षा से पूर्व विधिपूर्वक जिनप्रतिमा का अभिषेक करना होगा ।” उन्होंने पण्डित पन्नालाल साहित्याचार्य से पूछा कि आगम क्या कहता है ? उत्तर मिला, “कर तो सकते हैं पर अपने यहाँ नहीं चलता ।” वे बोलीं, “आपके यहाँ की आप जानों, हम तो आगम की मानेंगे ।”

उनकी भव्य दीक्षा अतिशय क्षेत्र पपौराजी में संपन्न हुयी । कालान्तर में वे ‘गणिनी आर्यिका विशुद्धमति’ नाम से विख्यात होकर सतना-गौरव हुयी । ज्ञानावरण के मन्द क्षयोपशम से यात्रा प्रारम्भ करनेवाली माताजी को स्वाध्याय और भक्ति ने तलस्पर्शी विदुषी बना दिया ! उन्होंने मरणकणडिका तथा, दुरूह गणित युक्त त्रिलोकसार एवं तिलोयपण्णत्ति जैसे कठिन ग्रन्थों के हिन्दी अनुवाद किये ।

✋शुभाशीर्वाद
आर्षमार्ग पोषक प्रभावना प्रभाकर बालाचार्य पावनकीर्ति

(26)महिलाओं के द्वारा भगवान का पंचामृत अभिषेक

देवाङ्नाओं द्वारा जिनप्रतिमाभिषेक~

नन्दीश्वर भक्ति

आचार्य कुन्दकुन्ददेव रचित नन्दीश्वर भक्ति की गद्यात्मक भक्ति, अंचलिका में देव-देवियाँ दोनों द्वारा अनेक प्रकार के अभिषेकों का वर्णन~

इच्छामि भंते ! णंदीसर-भत्ति-काउस्सग्गो कओ तस्सालोचेउं । णंदीसर-दीवम्मि चउदिस-विदिसासु अंजण-दधिमुह-रदिकर-पुरुणगवरेसु जाणि जिण-चेइयाणि ताणि सव्वाणि तिसुवि लोएसु भवणवासिय-वाणवेंतर-जोइसिय-कप्पवासियत्ति चउव्विहा देवा सपरिवारा दिव्वेहि गंधेहि दिव्वेहि पुप्फेहि दिव्वेहि धूवेहि दिव्वेहि चुण्णेहि दिव्वेहि वासेहि दिव्वेहि ण्हाणेहि णिच्चकालं अंचंति पूजंति वंदंति णमंसंति णंदीसर महाकल्लाणं करंति अहमवि इह संतो तत्थ संताइं णिच्चकालं अंचेमि पूजेमि वंदामि णमंसामि दुक्खक्खओ कम्मक्खओ बोहि-लाहो सुगइ-गमणं समाहि-मरणं जिण-गुण-संपत्ति होउ मज्झं ॥

अर्थ~हे भगवन् ! मैं अपने द्वारा किये गये नन्दीश्वर-भक्ति विषयक कायोत्सर्ग की आलोचना का इच्छुक हूँ । नन्दीश्वर द्वीप में चार दिशाओं एवं विदिशाओं में अञ्जन, दधिमुख और रतिकर नामक विशाल उत्तम पर्वतों पर जितने जिन चैत्य हैं, उन सबकी तीनों लोकों में भवनवासी, वान-व्यन्तर, ज्योतिष्क और कल्पवासी, ऐसे चतुर्विध देव, परिवार सहित दिव्य गन्धों से, दिव्य पुष्पों से, दिव्य धूपों से, दिव्य चूर्णों से, दिव्य वस्त्रों से और दिव्य अभिषेकों से नित्य-काल अर्चना, पूजा, वन्दना और नमस्कार करते हैं एवं नन्दीश्वर का महाकल्याणक उत्सव करते हैं । मैं भी यहाँ रहते हुए वहाँ विद्यमान जिन-चैत्यों की नित्यकाल अर्चना, पूजा, वन्दना और नमस्कार करता हूँ ।

स्पष्टीकरण~चार प्रकार के देव अपनी देवियों आदि के परिवार सहित

१.) दिव्य गन्धों से = मनोहर सुगन्धित अनुलेपनों से,
२.) दिव्य पुष्पों से = कल्पतरुओं के सुगन्धयुक्त भव्य पुष्पों की सुन्दर मालाओं से,
३.) दिव्य धूपों से = धुएँ से सम्पूर्ण वातावरण को सुवासित करने वाली विभिन्न प्रकार की श्रेष्ठ धूपों से,
४.) दिव्य चूर्णों से = माँडना बनाने योग्य उज्ज्वल रंग-बिरंगे मनमोहक चूर्णों से,
५.) दिव्य वस्त्रों से = जिनबिम्बों के ऊपर पूजा-भक्ति करते समय मनोरम चन्दोबे लगा कर एवं
६.) दिव्य अभिषेकों से = भाँति-भाँति के जो भी श्रेष्ठ तरल पदार्थ एवं चूर्ण हैं, उनके द्वारा मनोहारी अभिषेकों के द्वारा नन्दीश्वर द्वीप में विद्यमान अकृत्रिम चैत्यों की तीनों काल अर्चना, पूजा, वन्दना और नमस्कार करते हैं; नन्दीश्वर का महाकल्याणक उत्सव करते हैं ।

मैं कुन्दकुन्दाचार्य भी यहाँ मनुष्यलोक में रहते हुए साधु की मर्यादा में उन्हीं देवों के समान वैभवपूर्वक वहाँ विद्यमान आयतनों की स्थापनारूप से नित्य-काल अर्चना, पूजा, वन्दना और नमस्कार करता हूँ ।

भावार्थ~यहाँ पर आचार्य कुन्दकुन्ददेव ने अहमवि = ‘मैं भी’ का प्रयोग इसलिये किया है क्योंकि पहले से ही जो देवगण नन्दीश्वर द्वीप में सपरिवार अर्चना आदि विधि कर रहे हैं, उनके साथ वे अपने को भी सम्मिलित करना चाहते हैं । वे कहते हैं कि जिस प्रकार अपने-अपने परिवारों के साथ भवनवासी, वानव्यन्तर, ज्योतिष्क एवं कल्पवासी देव जिनबिम्बों की भव्य आराधना करते हैं, उनकी भाँति मैं भी इस मनुष्य-लोक में उपलब्ध उपर्युक्त साधन-सामग्री द्वारा (अपने चतुर्विध सङ्घरूपी परिवार के साथ) अर्चना, पूजा, वन्दना और नमस्कारात्मक सभी क्रियाएँ नित्य काल सम्पन्न करता हूँ ।

✋शुभाशीर्वाद
आर्षमार्ग पोषक प्रभावना प्रभाकर बालाचार्य पावनकीर्ति
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