कोलनूपाका जैनबासदी : एक शैक्षणिक केन्द्र
प्रसिद्ध कोलनूपाका जैन मंदिर के प्रांगण में, रसोईघर के दक्षिण दिशा में एक जैन मूर्ति संग्रहालय स्थित है। इसमें लगभग सौ से भी कम मूर्तियाँ और अभिलेख हैं, किन्तु ये सभी अत्यंत दुर्लभ और विशिष्ट हैं।
इन मूर्तियों में जैन चौमुखी स्तंभ, जैन स्तूप प्रतिमाएँ, जैन यक्षिणियाँ, जैन आचार्य एवं तीर्थयात्री, तथा भगवान बाहुबली की मूर्तियाँ सम्मिलित हैं। यहाँ कुछ ऐसे अभिलेख भी हैं जिनमें शिक्षा और अध्ययन से संबंधित नियम एवं शिक्षाएँ अंकित हैं।
मंदिर के बाहर एक पत्थर के स्तंभ पर उकेरी गई एक मूर्ति में भगवान महावीर दर्शाए गए हैं, जिनके नीचे एक जैन आचार्य व्यासपीठ पर बैठे हुए दिखाई देते हैं। उनके नीचे अंकित अभिलेख में निम्नलिखित पंक्तियाँ अपठनीय रूप में लिखी मिली हैं:
“श्रीवर्धमानः
सुजैनश्रुत तीर्थः
श्रीमूलसं
घेचु चिसि(त)
स(व) देशिगण …”
इन पंक्तियों का अर्थ यह है कि यह अभिलेख वर्धमान (महावीर) नामक जैनबासदी (जैन मठ) से संबंधित है। इसमें मूलसंघ नामक अध्ययन-संघ के देशी गण के विषय में उल्लेख मिलता है।
यह स्तंभ मूर्ति पुस्तकगच्छ और सरस्वती गच्छ से संबंधित है। ऐसे स्तंभ मूर्तियाँ हनमकोंडा के पद्माक्षिगुट्टा तथा रायचूर में भी पाई गई हैं। यहाँ की पुस्तकाकार आकृति (Book Ring) प्राचीन विद्यालयों और शिक्षा संस्थानों का प्रतीक मानी जाती है।
जैन अभिलेखों और साहित्य से यह ज्ञात होता है कि जैन मठों (जैनबासदी) में नि:शुल्क शिक्षा और चिकित्सा सेवाएँ प्रदान की जाती थीं। अतः इन अभिलेखों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि कोलनूपाका भी एक जैन शैक्षणिक केन्द्र रहा होगा।
बौद्ध विहारों, जैन बासदियों और शिव मठों में शिक्षा एवं चिकित्सा जैसी सेवाएँ धार्मिक विधान (Law) द्वारा ही नियंत्रित होती थीं। इसी प्रकार कोलनूपाका जैनबासदी का यह अभिलेख भी उस नई व्यवस्था का प्रतीक है, जिसमें शिक्षा और सेवा को धर्म का अभिन्न अंग माना गया है।
अभिलेख का कुछ भाग खंडित है, इसलिए पूरा विधान (Law) उपलब्ध नहीं हो पाया। यदि इसका शेष भाग मिल जाए, तो यह जैन शिक्षा व्यवस्था के एक नए ऐतिहासिक अध्याय को उजागर कर सकता है।