आराधना ही मुख्य
होती है
- आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
चंद्रगिरी डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ में ग्रीष्म कालीन वाचना में रविवारीय प्रवचन में
भगवती आराधना ग्रन्थ का वाचन करते हुए दिगम्बर जैनाचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
ने कहा की रस्सी के द्वारा पत्थर पर भी निशान पड़ जाते है ! जिसको नृत्य करना आता है
वह भगवान् के सामने नृत्य करके भी कर्म काट सकता है ! जिनेन्द्र भगवान् की स्तुति से
भुत प्रेत बाधा, दुःख, मनोगत बीमारियाँ आदि दूर हो जाती है ! सभी का पुण्य योग है की
इस प्रकार के ग्रन्थ को सुन रहे है ! अपराजित सूरी आचार्य के द्वारा सूचित किया गया
है की णमोकार मंत्र का प्रथम पद यह मंगलाचरण गणधर देवों के द्वारा कहा है ऐसा अभिप्राय
है ! मोहनिय कर्म के नष्ट हो जाने से तथा ज्ञानावरण और दर्शनावरण के चले जाने से जो
अतिशय युक्त पूजा के भाजन है यह अर्थ अरहंत पद से वहां कहा गया है क्योंकि अरहंत यह
नाम सार्थक है ! जगत प्रसिद्ध यह पद अर्हन्तों का विशेषण है ! क्योंकि ये पाँच महा
कल्याणक स्थानों में तीनो लोको के द्वारा प्रख्यात होते है ! आज आचार्य श्री विद्यासागर
जी महाराज का पड्गाहन एवं आहार दान का सौभाग्य चंद्रगिरी के कोषाद्यक्ष श्री सुभाष
चन्द्र जैन और उनके सुपुत्र निशांत जैन (निशु) को मिला ! इस उपलक्ष्य में चंद्रगिरी
में बनने वाली अस्ट धातु की चौबीसी में 21 वीं प्रतिमा विराजमान करने का सौभाग्य भी
इन्हें आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के आशीर्वाद से मिला ! आज चंद्रगिरी डोंगरगढ़
छत्तीसगढ़ में बाहर से आये मुख्य अतिथि श्री निर्मल पाटोदी और उनके सुपुत्र श्री अर्पित
पाटोदी ने आचार्य श्री को श्रीफल भेट कर आशीर्वाद प्राप्त किया ! राजनंदगांव,दुर्ग
, भिलाई, रायपुर , भाटापारा , धमतरी , इंदौर , दिल्ली , मुंबई , एवं समस्त भारत से
आये दर्शनार्थियों ने यहाँ धर्म लाभ लिया ! यह जानकारी डोंगरगढ़ के चंद्रसेना प्रेसिडेंट
श्री सप्रेम जैन ने दी !