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राष्ट्रपति को दी आचार्य विद्यासागर की पुस्तक 'द साइलेंट अर्थ'

 



नई दिल्ली ! राष्ट्रपति भवन में आयोजित सादगी भरे एक समारोह में कल राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को तपस्वी दार्शनिक संत आचार्य विद्यासागर द्वारा लिखित कालजयी हिन्दी महाकाव्य मूकमाटी के अंग्रेजी रपातंरण 'द साइलेंट अर्थ' की प्रथम प्रति भेंट की गयी। राष्ट्रपति भवन उस समय तालियों से गूंज उठा जब राष्ट्रपति ने वहां एकत्रित श्रध्दालुओं का जैन अभिवादन परपंरा जय जितेन्द्र से किया। इस अवसर पर बड़ी तादाद में श्रध्दालु तथा साधु उपस्थित थे। पुस्तक की प्रथम प्रति सर्वश्री अशोक पाटनी, अभिनंदन जैन तथा एनके जैन ने भेंट की। इस अवसर पर राष्ट्रपति का स्वागत करते हुये फिल्मकार अनुपमा जैन ने कहा कि आचार्य श्री के प्रत्यक्ष आभामंडल राष्ट्रपति भवन में साक्षात अवतरित हुआ है और इस आलोक में देश की प्रथम नागरिक को आचार्य श्री की पुस्तक भेंट की जा रही है। उन्होंने कहा कि आचार्य श्री का जीवन सत्य, कल्याण से जन कल्याण की यात्रा है। घोर तपस्या, चिन्तन मनन के साथ -साथ वह एक प्रबुध्द तथा संवेदनशील दार्शनिक लेखक हैं। यह आचार्य श्री की संवेदनशीलता है कि उन्होंने माटी जैसी पद दलित एवं व्यथित वस्तु को महाकाव्य का विषय बना कर उसकी मूक वेदना और मुक्ति की आंकक्षा को वाणी दी। उन्होंने कहा कि दरअसल यह महाकाव्य स्वयं को और अपने भविष्य को समझने की नयी दृष्टि देता है और दलितों और शोषितों को उत्थान की आस देता है कि कुंभकार किस तरह मिट्टी को शुध्द बना कर उसे मंदिर का पवित्र कलश बनाने की क्षमता रखता है। सुश्री जैन ने कहा कि यह महाकाव्य कर्म के बंधनों से आत्मा की भक्ति यात्रा तमाम विकृतियां मिटाकर प्रभु से एकाकार होने की यात्रा पर्व है। पुस्तक अंग्रेजी, बंगला, मराठी, कन्नड़ में अनुदित हो चुकी है तथा लगभग 40 शोधकर्ता इस पर पीएचडी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आचार्य श्री का जीवन स्वयं ही दर्शन है। उनका कहना है अहिंसा कायर नहीं कर्तव्य निष्ठा बनाती है। राजनीति जब धर्म से जुड़ जाती है तो साधना हो जाती है। जीवन एक केन्वास है यह हम पर है हम उसमें कैसा रंग भरे। उन्होंने कहा कि गुरूवर आज के दौर के विल्क्षण संत हैं। उनका तप अप्रतिम है। कठोर दिगंबर जैन चर्या का पालन करते हुए बीसियों सालों से न नमक खाया, न चीनी। हजारों किमी की नंगे पांव यात्रा करते हुए जंगल जंगल भटके। कठोर तपस्या, जन कल्याण, स्वास्थ्य मनन, चिंतन के साथ सतत लेखन अदभुत है। उनके संघ में अधिकतर उच्च शिक्षा प्राप्त एमएबीएमटेक, मेडिकोज एम बी ए तथा उच्चाधिकारी शामिल हैं जो संसारिक सुख त्याग कठिन तप साधना में रत हैं। आचार्य लगभग एक दर्जन से अधिक आध्यात्मिक व साहित्यक ग्रंथ लिख चुके हैं जिनका संस्कृत, अंग्रेजी, हिंदी में अनुवाद हो चुका है।